रविवार, 3 अगस्त 2008

महंगाई से ज़्यादा फिक्र महंगाई-दर की ! !

पिछले कई महीनों से सारे देश में बढ़ती महंगाई चर्चा का एक प्रमुख विषय बनी हुई है । संसद हो या बाहर, मीडिया हो या आम सभा सभी ओर बढ़ती महंगाई की ही चर्चा है ।

आम आदमी का जीना दूभर हुआ जा रहा है परंतु सरकार को तो लगता है महंगाई-नियंत्रण से अधिक महंगाई-दर के नियंत्रण की ज़्यादा फिक्र है । आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों पर नियंत्रण की बजाय सी.आर.आर, रेपो-रेट, कर्ज पर ब्याज की दरों आदि में परिवर्तन पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है पर महंगाई-दर है कि बढ़ती ही जा रही है ।

देश में इस वर्ष गेहूँ की भरपूर फ़सल हुई है सरकारी खरीद भी भरपूर हुई परंतु दाम हैं कि बढ़ते ही जा रहे हैं । सरकार इस तरफ ध्यान देने की बजाय परमाणु-करार, वाम-दलों से बनते-बिगड़ते सम्बन्धों, राजनीतिक जोड़-तोड़, पूँजी-बाज़ार की उठा-पटक में ज़्यादा व्यस्त दीखती है ।

मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहते हुए यह दुर्दशा देख कर आश्चर्य भी होता है और साथ-साथ दुःख भी ।

बेहतर यह होगा कि सरकार राजनीतिक जोड़-तोड़ और वित्तीय आँकड़ों के खेल को छोड़कर बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण के लिये आवश्यक प्रयासों पर ध्यान केन्द्रित करे ।

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