मंगलवार, 13 नवंबर 2012
रविवार, 3 अक्टूबर 2010
अयोध्या : फैसले के पश्चात

मेरे विचार में अब जबकि मामले से सम्बन्धित प्रमुख पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का मन बना रहे हैं राजनेताओं और सांप्रदायिक नेताओं को चाहिये कि वे अपने लाभ के लिये इस मामले का इस्तेमाल न करें और व्यर्थ की बयानबाजी से बाज़ आएं ।
सभी पाठकों के विचार एवं प्रतिक्रियाएं सादर आमंत्रित हैं ।
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
अयोध्या : कुछ तस्वीरें



सभी पाठकों की प्रतिक्रियाएं सादर आमंत्रित हैं ।
गुरुवार, 12 नवंबर 2009
हिन्दी के मुख पर राजनीति का तमाचा
आप भली-भांति समझ गये होंगे कि मैं किस घटना के विषय में बात कर रहा हूँ । शायद आप सभी इसके विषय में विस्तार से जान चुके होंगे । इस घटना से यह स्पष्ट है कि भारत में राजनीति कितने निम्न स्तर तक पहुँच चुकी है । राजनीतिज्ञ अपने लाभ के लिये राष्ट्रभाषा के अपमान सा जघन्य कृत्य करते हुए ज़रा भी लज्जित नहीं होते ।
यह हमारे संविधान निर्माताओं और राजनीतिज्ञों के ढुल-मुल रवैये का ही परिणाम है कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों के पश्चात भी हमारे देश में राष्ट्र,राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रभाषा के उचित सम्मान का अभाव है ।
जिस संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की बात हो उसी के मंदिर में राष्ट्रभाषा के अपमान की ऐसी घटना वास्तव में अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण व शर्मनाक है ।
आज जब कई विदेशी भी हिन्दी सीख रहे हैं और हम संयुक्तराष्ट्र जैसे मंच पर हिंदी को स्थान दिलाने की बात कर रहे हैं उस समय हमारे अपने देश में ऐसी घटनाओं के चलते विश्व-समाज को क्या संदेश जायेगा यह विचार शायद हमारे राजनेताओं के मन को ज़रा भी विचलित नहीं करता ।
अपने राजनीतिज्ञ भाइयों से मेरा अनुरोध है कि वे शीघ्रातिशीघ्र अपने ढुल-मुल रवैये को त्याग कर हिंदी को उसका उचित स्थान और सम्मान दिलाने की दिशा में प्रयासरत हों । साथ ही अपने देशवासी भाईयों से भी अनुरोध है कि वे ऐसे राजनीतिज्ञों एवं राजनैतिक दलों को अपने प्रतिनिधित्व का अधिकार कदापि न दें जिनके मन राष्ट्रभाषा का सम्मान न हो
मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
उधार की अर्थव्यवस्था और मंदी
आज सर्वत्र अर्थव्यवस्था में आयी मंदी की चर्चा है । उद्योग जगत हो या सेवा क्षेत्र ,बैंकिंग हो या भवन निर्माण क्षेत्र सभी मंदी की मार से कराह रहे हैं । उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में कमी के फलस्वरूप औद्योगिक उत्पादन में कमी आयी है । कंपनियां अपने खर्चों में कटौती करने के लिये कर्मचारियों की छंटनी करने में लगी हैं जिससे बेरोज़गारी बढ़ रही है । इस मंदी के जनक अमेरिका में तो स्थिति एशियाई देशों की अपेक्षा कहीं अधिक भयावह है । कई बैंक एवं कंपनियां या तो दिवालिया हो चुकी हैं अथवा दिवालियेपन की कगार पर हैं ।
मंदी की इस स्थिति के मूल कारणों का विश्लेषण करने पर इसका एक प्रमुख कारण उधार की अर्थव्यवस्था ही प्रतीत होता है । अमेरिका चूंकि इस अर्थव्यवस्था का जनक एवं प्रसारक है अतः मंदी का सर्वाधिक दुष्प्रभाव भी वहीं नज़र आ रहा है । अमेरिकी अर्थव्यवस्था के अन्य देशों पर प्रभाव के कारण देश भी इसके दुष्परिणामों से अछूते नहीं हैं ।
प्राचीन समय से ही हमारे देश में यह मान्यता रही है कि व्यक्ति को अपने पैर उतने ही पसारने चाहिये जितनी लंबी चादर हो अर्थात अपने संसाधनों से बढ़कर खर्च करने को उचित नहीं ठहराया जाता रहा । कई सदियों तक विश्व के सभी देश इस मान्यता को सही ठहराते हुए इसका पालन करते रहे ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् अमेरिका में उपभोक्ता संस्कृति का तेज़ी से विकास हुआ और धीरे-धीरे इस विचार को बल मिलता गया कि वस्तुओं के उपभोग का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को है । इसके साथ ही संसाधनों के अभाव में आज उधार लेकर वस्तु का मूल्य चुकाकर उपभोग करने और बाद में थोड़ा-थोड़ा कर ऋण चुकाने की व्यवस्था का जन्म एवं विकास हुआ । आगे चलकर इस व्यवस्था का प्रसार सम्पूर्ण विश्व में तेज़ी से हुआ । ऋण की आसान उपलब्ध्ता से उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में तेज़ी से वृद्धि हुई परिणामस्वरूप उद्योगों एवं सेवा-क्षेत्र का तेज़ी से विकास हुआ । उधार की यह अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर हावी होती गयी ।
ऋण लेकर शिक्षा ग्रहण करने से लेकर मकान,कार,फर्नीचर एवं विलासिता की वस्तुएं खरीदने में मानों होड़ सी लग गयी । धीरे-धीरे इस व्यवस्था के दुष्परिणाम भी सामने आने लगे । संसाधनों से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति के कारण लोग ऋण चुकाने में असमर्थ होने लगे । ऋण वसूल न कर पाने के कारण बैंकों की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी और वे दिवालिया होने लगे । शेयर बाज़ारों में अभूतपूर्व गिरावट देखी गयी । धन की कमी एवं उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में कमी के फलस्वरूप उद्योगों पर बुरा असर पड़ा और सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को मंदी ने अपनी चपेट में ले लिया । इस प्रकार उधार की वह अर्थव्यवस्था जो कभी विकास का कारण बनी थी आज उसके दुष्परिणाम अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी के रूप में देखे जा रहे हैं ।
आर्थिक दुष्परिणामों के अतिरिक्त उधार की अर्थव्यवस्था का एक अन्य पहलू यह है कि यह कुछ लोगों में उधार लेकर न चुकाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के साथ-साथ ऋण न चुका सकने के फलस्वरूप मनुष्य के आत्मसम्मान में गिरावट का कारण भी बनती है ।
शुक्रवार, 15 अगस्त 2008
सुन्दरता - अनुभव एवं अभिव्यक्ति
प्रत्येक व्यक्तित्व अथवा वस्तु में एक सुन्दरता छिपी होती है । आवश्यकता है तो सिर्फ उसे पह्चानने की, एक दृष्टि की जो हर वस्तु अथवा व्यक्तित्व में छिपी सुन्दरता को पहचाने, उसे ढूँढ निकाले ।
कभी नाव चलाते हुए नाविक को देखें । उसका शांत, स्मित चेहरा कितना मोहक लगता है या देखें खेत में काम करते हुए किसान को या एक काम करते हुए मज़दूर को या कला की सृष्टि में लीन एक कलाकार को या फिर संगीत का अभ्यास करते हुए गायक अथवा संगीतकार को । प्रत्येक की मुद्रा में एक भावनात्मक सुन्दरता एवं मोहकता नज़र आती है । इसे पह्चानने एवं अनुभव करने के लिये आवश्यकता है एक दृष्टि की जो स्वयं निर्मल एवं पूर्वाग्रह से मुक्त हो ।
आवश्यकता है न सिर्फ व्यक्तित्व में छिपी इस सुन्दरता को पहचानने की एवं अनुभव करने की बल्कि उसे उस व्यक्ति के सामने व्यक्त करने की । हमारी यह अभिव्यक्ति उस व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के एक सुन्दर पक्ष से परिचित कराती है और अपने में छिपी सुन्दरता को उजागर करने को प्रेरित करती है ।
उत्तरोक्ति : उपरोक्त पंक्तियों में उल्लिखित विचार की उत्पत्ति कुछ दृश्यों के अनुभव का परिणाम है । इन पंक्तियों में वर्णित दृश्यों या इन जैसे कई दृश्यों को आपने भी अनुभव किया होंगा । पाठकों से अनुरोध है कि इस विषय में अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करें । पाठकों की प्रतिक्रियाओं से लेखक का उत्साहवर्धन ही नहीं मार्गदर्शन भी होता है ।
रविवार, 3 अगस्त 2008
महंगाई से ज़्यादा फिक्र महंगाई-दर की ! !
पिछले कई महीनों से सारे देश में बढ़ती महंगाई चर्चा का एक प्रमुख विषय बनी हुई है । संसद हो या बाहर, मीडिया हो या आम सभा सभी ओर बढ़ती महंगाई की ही चर्चा है ।
आम आदमी का जीना दूभर हुआ जा रहा है परंतु सरकार को तो लगता है महंगाई-नियंत्रण से अधिक महंगाई-दर के नियंत्रण की ज़्यादा फिक्र है । आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों पर नियंत्रण की बजाय सी.आर.आर, रेपो-रेट, कर्ज पर ब्याज की दरों आदि में परिवर्तन पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है पर महंगाई-दर है कि बढ़ती ही जा रही है ।
देश में इस वर्ष गेहूँ की भरपूर फ़सल हुई है सरकारी खरीद भी भरपूर हुई परंतु दाम हैं कि बढ़ते ही जा रहे हैं । सरकार इस तरफ ध्यान देने की बजाय परमाणु-करार, वाम-दलों से बनते-बिगड़ते सम्बन्धों, राजनीतिक जोड़-तोड़, पूँजी-बाज़ार की उठा-पटक में ज़्यादा व्यस्त दीखती है ।
मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहते हुए यह दुर्दशा देख कर आश्चर्य भी होता है और साथ-साथ दुःख भी ।
बेहतर यह होगा कि सरकार राजनीतिक जोड़-तोड़ और वित्तीय आँकड़ों के खेल को छोड़कर बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण के लिये आवश्यक प्रयासों पर ध्यान केन्द्रित करे ।
मंगलवार, 3 जून 2008
अमर-ज्योति

बुधवार, 16 जनवरी 2008
क्या किसी व्यक्ति को 'मंकी' कहना नस्लभेद है ?
अरे भई ! हरभजन के एंडृयू साइमंड्स को कथित रूप से 'मंकी' कहने पर इतना बवाल हुआ कि समूचे देश में और क्रिकेट खेलने वाले कुछ अन्य देशों में हाहाकार सा मच गया । न्यूज़-चैनलों व अन्य मीडिया को आगामी कुछ दिनों के लिये ख़ासा मसाला भी मिल गया ।
जो बात मैदान पर ही या मैदान के बाहर आपस में बातचीत से सुलझायी जा सकती थी उस पर मैच-रेफ़री माइक प्राक्टर की अदालत में छः घंटे तक माथापच्ची करने के बाद जो फैसला आया उसे 'भद्र पुरुषों' के खेल के लिये कलंक कहना उचित होगा ।
दरअसल तथाकथित 'गोरे' देशों के खिलाड़ी क्रिकेट को अपनी बपौती समझते हैं और अन्य देशों के खिलाड़ियों को हेय दृष्टि से देखते हैं । वे अपने अहम की तुष्टि के लिये मैदान पर अक्सर छींटाकशी एवं गाली-गलौज करते रहते हैं परंतु यदि विपक्षी खिलाड़ी पलटकर जवाब दे तो तिलमिला जाते हैं और इसे खेल-भावना के विरुद्ध बताकर दंड देने की माँग करते हैं।
अभी तक का क्रिकेट-इतिहास ऎसा ही रहा है । यह शायद पहली बार है कि उन्हें इस तरह के मामले में विपक्षी दल के जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा है ।
मैदान पर होने वाली साधारण सी छींटाकशी की घटना को तूल देकर नस्लभेद का रंग दे देना निहायत शर्मनाक है और इसका ज़ोरदार विरोध होना ही चाहिये ।
अंत में इस घटना पर एक हल्का-फुल्का नज़रिया :
पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी माइकल होल्डिंग का इस घटना पर बयान - 'मंकी' शब्द को नस्लभेद का नाम देना ग़लत है क्योंकि हमारे पूर्वज बन्दर ही थे ।
होल्डिंग के इस बयान पर एक भारतीय की टिप्पणी - 'मंकी' शब्द हमारे लिये नस्लभेदी भले न हो परंतु 'कंगारुओं' के लिये तो है ही ।
शुक्रवार, 23 नवंबर 2007
हाय ये सीरियल ! ! !

केबिल टीवी के आगमन के कुछ वर्षों बाद तक भी कुछ अच्छे ऐतिहासिक एवं सामाजिक सीरियल देखने को मिलते रहे । आज से लगभग छह-सात वर्ष पूर्व अवतरण हुआ एकता कपूर की बालाजी टेली फिल्मस के कभी न समाप्त होने वाले मेगा-सीरियलों का । इन सीरियलों में समाज के उच्च-प्रतिष्ठित बहुसदस्यीय परिवारों का जो चित्रण है वह निहायत ही अजीब और विकृतियों से भरा है ।
ये परिवार आज के इस युग में एक संयुक्त परिवार के रूप में रहते हैं जो अपने आप में एक आश्चर्य से कम नहीं । यूँ तो ये परिवार संस्कारी एवं परम्पराओं का सम्मान करने वाले कहलाते हैं परंतु स्वयं अपने घर में ही वे इन संस्कारों की कैसे धज्जियाँ उड़ाते हैं यह देखते ही बनता है । इस सबके कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं कृपया गौर फरमाएँ :
1. बेटियाँ विवाह के पश्चात भी अपने पति के घर न रहकर अपने बच्चों समेत अपने मायके में पड़ी रहती हैं और अपनी भाभियों तथा घर के अन्य सदस्यों के विरुद्ध षडयंत्र रचती रहती हैं और उनके संस्कारी माँ-बाप, दादा-दादी व अन्य बड़े मूक दर्शक बने देखते रहते हैं ।
2. पोते-पोतियाँ विवाह के पश्चात भी अपने दादा-दादी से बहुत अच्छा व्यवहार करते हैं जबकि उनके माता-पिता का अपने बड़ों से व्यवहार निकृष्ट स्तर का होता है ।
3. लड़कियाँ लड़कों को मनुष्य नहीं वरन खेलने की वस्तु समझती हैं और उन्हें 'हासिल' करने के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार रहती हैं ।
4. महिलाओं के पास करने के लिये कुछ नहीं होता सिवाय घर व रिश्ते की अन्य महिलाओं को नीचा दिखाने एवं उनके खिलाफ षडयंत्र रचने के ।
5. माताएं अपनी पुत्रियों को अपने पतियों को उंगलियों पर नचाने और पति के परिवार को तोड़ने एवं उनकी सम्पत्ति हथियाने के विषय में सलाह देती रहती हैं ।
6. अधिकतर पात्रों के लिये धन-सम्पत्ति ही सब कुछ होती है और उसके लिये वे सभी मानवीय मूल्यों को ताक पर रख देने एवं एक दूसरे की जान लेने को तत्पर रहते हैं । 7. लगभग सभी पात्र उच्च-शिक्षित होते हुए भी आपस में जोर-जोर से चिल्लाकर बात करते हैं ।
उपरोक्त उदाहरणों से ऐसा प्रतीत होता है कि ये सीरियल यह दर्शाना चाहते हैं कि समाज में मानवीय मूल्यों का कोई महत्व नहीं है वरन धन-सम्पत्ति ही सर्वोपरि है ।
इस प्रकार के चरित्र-चित्रण से समाज पर, विशेषकर महिलाओं एवं बच्चों पर कितना बुरा असर पड़ सकता है यह आज देखा जा सकता है ।
सीरियल निर्माताओं से विनम्र अनुरोध है कि वे ऐसे सीरियलों का निर्माण करें जो केवल उच्च वर्ग के घृणित पक्ष को ही न दिखाएं वरन उनमें समाज के उज्जवल पक्षों एवं मानवीय-मूल्यों का अधिकाधिक चित्रण हो और साथ ही साथ वे शिक्षाप्रद भी हों ।
साथ ही बुद्धजीवियों का भी यह कर्तव्य है कि वे इन सीरियलों के माध्यम से समाज में फैलायी जा रही विकृत सोच की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा करें ।
बुधवार, 24 अक्टूबर 2007
मेरे सपनों का विकसित राष्ट्र - भारत
भारत आज सूचना प्रौद्योगिकी के विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहा है परंतु हमारे अपने देश में इसका प्रसार सिर्फ कुछ नगरों तक ही सीमित है । आज घरेलू एवम औद्योगिक उपयोग की लगभग हर मशीन हमारे देश में उपलब्ध है परंतु उसके परिचालन के लिये आवश्यक विद्युत का उत्पादन हम नहीं कर पा रहे हैं । आज उच्चतम तकनीक के बेहतरीन वाहनों का उत्पादन हमारे देश में होता है परन्तु हमारे देश की अधिकांश सड़कें जर्जर अवस्था में हैं । आज भी स्वच्छ पेयजल,शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं के लिये करोड़ों देशवासी तरसते हैं । विकास की योजनाएं केवल घोषणाएं बनकर रह गयी हैं ।
विकास की धारा सभी तक पहुँचे इसके लिये हमें तेजी से बढ़ती जनसँख्या पर नियंत्रण करना होगा अन्यथा संसाधनों की कमी,बेरोज़गारी एवम आवासीय तथा कृषि योग्य भूमि की कमी जैसी समस्याओं से पार पाना असम्भव सा हो जायेगा । जनसँख्या नियंत्रण से ही नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि सम्भव है ।
इस प्रकार की चुनौतियों का सामना हमें प्राथमिकता से करना होगा तभी हम सही मायनों में एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर हो सकेंगे ।
मेरा सपना एक ऐसे विकसित भारत का है जो आर्थिक एवं वैज्ञानिक रूप से सक्षम तथा आध्यात्मिक एवम मानवीय मूल्यों से युक्त हो और जहाँ विकास जन-जन तक पहुँचे । देशवासी ईमानदार, शिक्षित, स्वस्थ, आत्मनिर्भर एवं योग्य हों तथा मानव जीवन मूल्यवान हो ।

